खुन्नसों का उप चुनाव और खुन्नस भरे नतीजे…….

जी हाँ रोहडू और ज्वाली का उप चुनाव यही सब था..विशुद रूप से खुन्नसों का चुनाव और शुरू से लेकर अंत तक इसमें खुन्नसें निकली जाती रहीं और अभी भी निकली जा रही हैं. इसमें कोई दो राय नहीं की इस उप चुनाव के नतीजे सत्ता पक्ष और विपक्ष की सेहत पर कोई ज्यादा असर डालने वाले तो थे नहीं. ऐसे में दोनों पार्टियों के नेताओं ने इस बहाने अपने विरोधियों को चित करने की रणनीति रची. हर खेमा २०१३ की सियासी तस्वीर को सामने रख उसमें अपने हिसाब से रंग भरना चाहता था ताकि आगे चलकर इसके रंग उसके लिए शोखी भरे हों. लेकिन खुद घी पीकर सेहत बनाने के बजाये दुसरे की जड़ों मैं तेल डालने की जुगत लगाई गयी और इस तरह यह उप चुनाव बन गया खुन्नसों का उप चुनाव. पहले बात कांग्रेस की. पार्टी को यह चुनाव जीतकर कोई बड़ा तमगा तो लगना नहीं था लिहाज़ा उसके दोनों खेमों ने इसे भाजपा के बजाये एक दुसरे से हिसाब करने का अखाडा बना डाला. रोहडू से पार्टी प्रत्याशी के तौर पर मात्र प्रतिभा सिंह का नाम जाने के बाबजूद दिल्ली में रातों-रत दो और नाम पहुंचाए गए .

यह नाम थे वीरभद्र सिंह के ही खासमखास रहे हरीश रावत और मंजीत ठाकुर के. यह दोनों वीरभद्र सिंह और प्रतिभा सिंह के रोहडू में एक तरह से दूत हुआ करते थे लेकिन कुर्सी के लालच में फंस कर इन्होने टिकट की दावेदारी जाता डाली. इनके पीछे अब वीरभद्र और प्रतिभा के बजाये विद्या स्टोक्स और कौल सिंह का हाथ था और यह हाथ फिलवक्त इतना मजबूत था की उसने प्रतिभा सिंह का टिकट कटवा कर वीरभद्र सिंह के खिलाफ खुन्नस निकाली. जाहिर है यह वीरभद्र सिंह के प्रदेश कांग्रेस में चले आ रहे एक छात्र राज को सीधी चुनौती थी. लेकिन इससे पहले की राजा कुछ समझ पते विरोधी धड़ा अपना काम कर चुका था. दरअसल रोहडू को लेकर विरोधी खेमे ने वीरभद्र सिंह के अति-आत्मविश्वास का लाभ उठाया. वीरभद्र सिंह ने सपने में भी नहीं सोचा था की रोहडू में उनकी पत्नी के अलावा किसी और को टिकट मिलेगा. वोह तो बाकायदा चुनाव प्रचार में भी जुट गए थे. ऐसे में जब उनके साथ छल हुआ तो उन्होंने भी जमकर खुन्नस निकली. शिमला में चुनाव प्रचार पर जाने से पहले उन्होंने विरोधी खेमे को खूब खरी-खोटी सुनाई.यहाँ तक कह दिया की जिन्होंने टिकट दिलवाया है वही प्रचार भी करें. लेकिन आखिर उन्होंने तो जाना ही था सो वोह गए भी.

विद्या स्टोक्स ने तो सीधे कह डाला की वोह रोहडू नहीं जायेंगी क्योंकि वोह वीरभद्र का घर है लिहाज़ा वहां जीत का दारोमदार भी उन्हीं पर वीरभद्र समर्थकों कौल सिंह जरूर गए और जब गए तो वीरभद्र समर्थकों ने उनपर खुन्नस निकाली. धक्का-मुक्की हुयी और कौल सिंह गो बैक के नारे लगे. यहाँ तक की प्रतिभा का टिकट कटे से नाराज कार्यकर्ताओं ने इस बात का भी लिहाज़ नहीं किया की वीरभद्र उनके साथ थे. ऐसे में कौल सिंह को भी मौका मिल गया और खुन्नस में उन्होंने भी दोबारा रोहडू का रूख नहीं किया. ऐसे मैं सारा मामला वीरभद्र सिंह के ऊपर जा पड़ा. उन्होंने भी ऐलान कर दिया की किसी भी सूरत में रोहडू में भाजपा को नहीं जीतने देंगे. यहाँ तक कहा की रोहडू में भाजपा की जीत का मतलब भारत के किसी हिस्से पर पाकिस्तान के झंडे के लहराने जैसा होगा. लेकिन वोह भूल गए थे की यह खुन्नसों का उप-चुनाव था. मंजीत ने कौन सी खुन्नस निकाली यह तो मंजीत बताएँगे लेकिन उनके साथ कभी वीरभद्र सिंह की पूंछ बनने वाले विद्यासागर,गीता नेगी जैसे लोग अचानक भरे सियासी अखाडे में भूमिगत हो गए. यह लोग मालरोड पर तो दिखे लेकिन रोहडू में नहीं गए.

हाँ वीरभद्र सिंह ने पूरा जोर लगाया. यह पहला मौका था जब उन्होंने रोहडू में वोट मांगे. जो वीरभद्र अपने चुनाव में दो दिन से ज्यादा रोहडू नहीं गए उन्होंने पूरे दो हफ्ते तक दर्जनों जनसभाएं की और कांग्रेस के लिए (मंजीत के लिए नहीं ) वोट मांगे लेकिन यहीं बस नहीं हुयी जहाँ उनके खास सिपहसलार प्रतिभा का टिकट काटने की खुन्नस में मंजीत का साथ देने नहीं गए वहीं विरोधी खेमे ने पूरी शिद्दत से काम करते हुए कुछ इलाकों में चुनाव के दिन कांग्रेस के बूथ तक नहीं लगने दिए और यह सुनिश्चित बनाया की मंजीत हर जाएँ.क्योंकि उन्हें पता था की हर का ठीकरा सीधे वीरभद्र सिंह के सर पर फूटेगा.और हुआ भी यही.रोहडू मैं हर के बाद फ़िलहाल वीरभद्र सिंह खामोश मैं और लोग अब उनके अगले पलटवार का इंतज़ार कर रहे हैं जो निश्चित तौर पर खुन्नस भरा होगा.

अब बात भाजपा की.

ऐसा नहीं है की खुन्नसबाजी कांग्रेस में ही हुयी. बल्कि भाजपा में यह ज्यादा हुयी. फर्क सिर्फ इतना था की कांग्रेसीयों ने इसके लिए रोहडू को चुना तो संघियों ने यह काम ज्वाली में किया. वीरभद्र सिंह की ही तरह ज्वाली में राजन सुशांत अपनी पत्नी को टिकट दिलवाना चाहते थे . लेकिन बड़ी सफाई से विरोधी खेमे ने उनका स्वपन तोड़ डाला. एक सोची समझी रणनीति के तहत राजन सुशांत के ही भी से दावा करवाया गया और बाद में इसी आधार पर उनकी पत्नी का टिकट कटवाया गया. यही नहीं जब यह तय हो गया की ज्वाली में शांता खेमे के पास कमान है तो इसका भी पूरा इंतजाम किया गया की बलदेव चौधरी न जीतें. इसके लिए सुशन के भाई को आजाद चुनाव लड़वाया गया और उसकी आड़ में जम कर शांता के खिलाफ खुन्नस निकाली गयी. धूमल के कथित हनुमान नूरपुर के विधायक राकेश पठानिया को सुशांत के भी मदन शर्मा को मोहरे के तौर पर चलाये रखने की जिम्मेवारी सौंपी गयी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया .

राकेश क्योंकि शांता खेमे के पुराने सताए हुए थे लिहाज़ा उन्होंने जम कर खुन्नस निकाली. बदले में शांता खेमा भला कहा चुप्प बैठता लिहाज़ा उनकी तरफ से भी पूरे प्रचार के दौरान खूब तोपें दागी गयीं.राजन सुशांत ने सीधे -सीधे धूमल और उनके खास मंत्रियों को सन्देश कह डाला की उनकी ज्वाली में जरूरत नहीं है.यहाँ तक की अरसे से शांत बैठे शांता के सब्र का बाँध भी टूटा और उन्होंने भी रोहडू में खुशी राम के नामांकन से लौटते समय शिमला में भ्रष्ट अधिकारीयों को आड़ बनाकर धूमल पर निशाना साधा क्योंकि उन्हें एहसास हो चुका था की ज्वाली की कमान उनके हाथ देकर धूमल उन्हें वहां नीचा दिखाना चाहते हैं.

इस तरह दोनों पक्षों में जमकर खुन्नस बाजी के दौर चले. ऐसे में बात जब मतदाता के हाथ तक पहुँची तो उसने भी आखिर इन कलाबाज नेताओं पर खुन्नस निकाली और जो नतीजे खुन्नस भरे दिए. जी हाँ इससे ज्यादा खुन्नस लोग कया निकालते की दोनों को ही उनके घर मैं चित कर डाला.जो कांग्रेस रोहडू से एक दो नहीं चार दफा मुख्यमंत्री लाई थी वही कांग्रेस आज उसी रोहडू में औंधे मुहँ पडी है. . और जो भाजपा खुद्द को निचले हिमाचल की हितैषी कहती नहीं थकती थी उसे इसी तर्ज़ पर निचले हिमाचल मैं मतदाता ने नीचे दिखाया. हालाँकि दोनों जगह ऊपरी तौर पर यह लगता है की भितरघात के कारन ऐसा हुआ…लेकिन बता दें की रोहडू मैं खुशी राम को वीरभद्र सिंह से ज्यादा वोट मिले हैं और इसी तरह तमाम दावों के बावजूद सुजान सिंह पठानिया को सभी विरोधियों से पांच सौ मत ज्यादा मिले हैं.ऐसे में यह कहना की उसे टिकट मिलती तो वोह जेतता और यह नहीं लड़ता तो यह जीत जाता…यह बातें विशुद्ध रूप से दिल को बहलाने वाले गालिबना ख्यालयों से ज्यादा कुछ नहीं है. और बड़े नेता इस सच से वाकिफ हैं इसीलिए तो जीत हर को लेकर कोई शोर नहीं है. क्योंकि रोहडू में जीतने वालों के पास ज्वाली में हरने का कोई जवाब नहीं है और ज्वाली में जीतने वाले यह बताने के काबिल नहीं रहे की रोहडू में क्यों हर गए.

दरअसल सच तो यह है की स्वार्थ की राजनीती में जनता को मोहरा बनाते चले आ रहे नेताओं को इन नतीजों के जरिये एक सन्देश दिया है…यह सन्देश की यदि जनता खुन्नस निकलने पर आ गयी तो कया होगा यह सोच लेना.

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Born in 1971 at Hamirpur, Sanjeev has been a freelancer initially. He was the sub-editor of Ajit Samachar HIMACHAL EDITION at Jalandhar for 3 years when he shifted to Broadcast journalism with Nalini Singh’s famous AANKHON DEKHI. In 1998, he joined ZEE NEWS as a reporter for Shimla, joining MH-1 Newa in January 2007. email: shimlazee[at]yahoo[dot]com


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