बच्चों से हुसैन को मत छीनो

हिमाचल प्रदेश सरकार और प्रशासन ने भी अपने हाथ रंग लिए हैं। जो रंग इनके हाथों पर लगे हैं, वे होली के रंग नहीं हैं। वे कलाकृति बनाने के रंग भी नहीं हैं। वे समाज की रंगबिरंगी बनावट को मैला करने के रंग हैं। बल्कि गझिन भारतीय बनावट को छेकने वाले रंग हैं।

मामला मकबूल फिदा हुसैन के अध्याय को स्कूली पाठयक्रम से हटाने का है। हुसैन को हटाना उस उग्रता की एक कड़ी है जो पिछले कुछ वर्षों में देखने मे आ रही है। हमारे यहां नैतिकता के स्वनामधन्य पहरेदार आए दिन खड़े हो रहे हैं। उन्हें संस्कृति की इतनी अधिक चिंता सताने लग जाती है कि वे हिंसा पर उतर आते हैं। एक तरफ हम लोग हिंदू धर्म की सहिष्णुता और अहिंसा का राग अलापते नहीं थकते, दूसरी तरफ संस्कृति की रक्षा के नाम पर उग्र भीड़ को मुखर या मौन सहमति देते हैं। उग्र भीड़ हिंसा का अपराधी मजा लेती है, विवेक खो बैठती है और दूसरे के मत को सिरे से खारिज करती है।

एम एफ हुसैन की कलाकृतियों की इसी तरह के माहौल में तोड़-फोड़ हो चुकी है, मुकद्दमे चल चुके हैं। और दिल्ली न्यायालय ने वादियों को कड़ी फटकार लगाते हुए सांस्कृतिक सरोकार समझाए हैं और हुसैन की कलाकृतियों में कोई दोष नहीं पाया है। न्यायालय ने इस प्रसंग में खजुराहो और कामसूत्र के उदाहरण भी दिए। भारतीय मनीषा ने काम को कला और शास्त्र का दर्जा देते हुए कामसूत्र नामक ग्रंथ की रचना की है। हमारे यहां ज्यादातर मंदिर ही कलाओं को प्रश्रय और संरक्षण देते रहे हैं। खजुराहो इसका ज्वलंत उदाहरण है। धर्म में इतनी उदारता रही है कि वह जीवन को समग्रता में देखता रहा है।

लेकिन इधर लगता है कि धर्म-ध्वजा उठाकर चलने वालों ने विवेक और संवेदना को तिलांजलि दे दी है। भावना का स्थान उग्रता ने ले लिया है। हम सिर्फ खुद को ठीक समझने लगे हैं। दूसरे के लिए कोई जगह नहीं। चाहे वह विचार हो, भाव हो या जीवन शैली हो। इस दंभ (सेल्फ-राइटसनेस) के चलते कभी भाषा दबाई जाती है, कभी लड़कियों को वस्तु मानकर कब्जे में रखने के लिए हुड़दंग किए जाते हैं। मानो औरत एक व्यक्ति नहीं, जरखरीद गुलाम है। इसी तरह कभी कला का सफाया किया जाता है, कभी कलाकार को निशाना बनाया जाता है।

सब जानते हैं कि यह सब राजनीति के नाम पर या राजनैतिक लाभ लेने के लिए होता है। कभी प्रत्यक्ष कभी परोक्ष। आम चुनाव सिर पर हैं, शायद इसलिए भी इस तरह की घटनाओं का जोर है।

हिमाचल प्रदेश के स्कूली पाठयक्रम से हुसैन को हटाने के मसले का एक खतरनाक पहलू है। इस तरफ ध्यान देना जरूरी है। कोई स्वतंत्र गुट या गिरोह किसी तरह का विरोध करता है तो वह कानून व्यवस्था का मसला बनता है। प्रशासन को उससे निपटना होता है। लेकिन जब प्रशासन खुद ही इस तरह की पक्षपातपूर्ण हरकत करने लग जाए तो एक खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत मिलता है। इसका मतलब यह निकलता है कि प्रशासन संतुलित नहीं है। न्यायपूर्ण नहीं है। लोकतांत्रिक नहीं है। वह निष्पक्ष सरकार नहीं, सत्तासीन राजनैतिक दल के अधीन रह कर काम कर रहा है। बल्कि चापलूसी की हद तक तरफदारी कर रहा है।

यह प्रवृत्ति और भी ज्यादा खतरनाक इसलिए है क्योंकि मुख्यत: नौकरशाह ही प्रशासन चलाते हैं। नौकरशाही अधिकतर बुध्दिजीवी वर्ग से बनती है। कथित तौर पर हिमाचल का यह फैसला शिक्षा बोर्ड ने लिया है। जाहिर है इसके कर्ताधर्ता नौकरशाह और शिक्षाविद् हैं। अगर शिक्षाविद् पक्षपाती रुझान रखेगा तो इसका समाज पर लंबे समय तक दुष्प्रभाव पड़ेगा। लोकतंत्र कमजोर होगा। हम अगली पीढ़ी को वही पढ़ाएंगे जो एक विशष राजनैतिक दल पढ़ाना चाहता है। यह न्यायोचित तरीका नहीं है।

मतलब यह कि शिक्षा बोर्ड का यह फैसला न्यायोचित नहीं है। ऊपर से यह कहना कि हिमाचल के बच्चों के लिए हुसैन का महत्व नहीं है, सोभा सिंह का है। यह बचकाना त है। सोभा सिंह का हिमाचल क्यों पूरे भारत में विशष स्थान है। उन्हें आदर देने के लिए हुसैन को नहीं हटाया गया है। बल्कि हुसैन को हटाने के लिए उन्हें बिठाया गया है। एक तरह से सोभा सिंह का इस्तेमाल किया गया है। यह दोनों कलाकारों का अपमान है। हिमाचल के बच्चों को हुसैन को जानना जरूरी है। सोभा सिंह को तो विशेष तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए।

अगर सरकार और प्रशासन हिमाचल की कला संस्कृति के प्रति गंभीर है तो सोभा सिंह के नाम से कला महाविद्यालय चलाया जाना चाहिए। लेकिन प्रदेश की सांस्कृतिक नीति की दरिद्रता, दिशाहीनता और दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। जहां संस्कृति के नाम पर आधे अधूरे मन से केवल पर्यटकों को रिझाने की कवायद चलती हो और लगभग सारा बुध्दिजीवी और कलाकर्मी वर्ग घुन्ने मौन का खेल खेलता हो, वहां प्रदेश में एक भी कला, संगीत, नाटय विद्यालय का न होना अचंभे की बात नहीं है। लेकिन यह मसला अलग से लंबी और सुचिंतित बहस की मांग करता है।

फिलहाल सरकार और प्रशासन को हुसैन से संबंधित फैसला तुरंत वापस लेना चाहिए। और अपनी संतुलित, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक छवि को बहाल करना चाहिए।

RELATED POSTS



3 Responses for “बच्चों से हुसैन को मत छीनो”

  1. sudarshan Kumar says:

    Why Hussain is biased?

    http://www.hindujagruti.org/activities/campaigns/national/mfhussain-campaign/

    If nudity depicts the true art, then Why this prejudice against hindus and not his community members?
    see his paintings on this link………………..

  2. vijay sharma says:

    Hussain is a painter par excellent , but at the same time he is controversial too. What he painted a few decades ago was marvelous, except for his ‘passion’ for portraying Hindu goddesses in absurd manner. In the name of freedom of expression, he could do so withoout caring for the sentiments of Hindus, whearas he could not dare to paint females of Islamic mythology.

    If the chapter on Hussain has been removed from the school books, it does not effect on students or Hussain. In stead of including chapter on Sobha Singh, a chapter on the glorious “Kangra miniature painting” should have been included. Kangra art indeed is a great art acclaimed wordwide by renowned art historians and critics as well.

Leave a Reply





SUPPORT MY HIMACHAL CAUSE

SAVE THE WEAVER

ADVERTISEMENT

Switch to our mobile site

Log in - Flickr - Orkut - YouTube - Twitter - Copyright © 2006-2009- My Himachal-Disclaimer