सुबह-सुबह रोहतांग पार से युवा कवि अजय का फ़ोन आ गया | मुंबई की ख़बरों से उसके स्वर में चिंता थी | उन्होंने पूछा, उत्तर भारतीयों पर कोई संकट तो नहीं है? यह संकट अभी सफ़ेद कालर वालों पर नहीं आया है | इसलिए हम बाबु टाइप लोग बचे हुए हैं |
यों यह नीली कालर वालों पर भी नहीं आया है| मुंबई में उत्तर भारतीय नीली कालर से भी नीची पायदान पर हैं | सब्जी भाजी वाले, ढूध वाले, इस्त्री वाले, आटा चक्की वाले, भेल पुरी वाले | टैक्सी ऑटो वाले | छोटे मोटे काम धंधों में लगे हुए हैं| यह नीली कालर से भी नीचे बिना कालर के कुरते और धोती वाले कर्मठ लोग हैं| असंगठित हैं| लेकिन जिवट से भरपूर |
एक ज़माने में इनके पूर्वज सूरीनाम गए थे | बाद के लोग कोलकत्ता जाने लागे| वहां बिहारी नाम मिला | आज तक दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह पुकारे जाते हैं | इनकी लुगईयॉ घर – गांव में बिदेसियाँ गाती थी | यह बिदेस (कोलकत्ता) में पैसा कमाते थे | धीरे धीर कोलकत्ता शहर की आंच मद्धम पड़ गयी | मुंबई महानगर काम खोजले वालों की खान बना | रेलों में ठुसकर मुंबई पहुँचने वाले सिर्फ़ उत्तर भारतीय ही नहीं हैं | वे बदनाम ज्यादा हैं | केरल से, बंगाल से, गुजरात से , लोग यहाँ आते रहे हैं| कई बरसों से | वो भी थोक के भाव से |
बीती सदी के साठ के दशक में जब बाल ठाकरे का उदय हुआ था, तब मंगलोर के शेट्टी लोग पिट चुके थे | और बाल ठाकरे ने मराठी माणुस के नारे के साथ शिव सेना बनाई थी|
राज ठाकरे शिव सेना की टूटी हुई टहनी की तरह निकले हैं | उसी की नक्शे कदम पर चलने की तवायद कर रहे हैं| महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनस) एक तीर से दो निशाने साधना चाहती है| मराठी माणुस को जागृत करो और शिव सेना के मुद्दे को छीनो|
पर शिव सेना मराठी माणुस के मुद्दे से दूर जा चुकी है | हाल की हरकतों को जनता गुंडागर्दी की तरह ही ले रही है | मराठी भाषी समाज तटस्थ है | इधर हुआ यह है की एक तरफ़ मनस (महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ) नेता उत्तर भारतीयों पर बरसे और उधर पुलिस कमिश्नर के बेटे की शादी में बधाई देने पहुँच गए| जैसे पुलिस गरीब उत्तर भारतीयों की पिटाई से बेखबर थी | इधर हो यह रहा है की मीडिया हल्ला करता है, तो पुलिस और प्राशासन जगता है | यह रवैय्या सामाजिक ताने-वाने के लिए खतरनाक है | मनस का यह कदम मुंबई की स्पिरिट से बिल्कुल मेल नहीं खाता | उनका सथितियों का आकलन ही ग़लत है | मराठी माणुस के नारे का दौर निकल गया है |
ग्लोबल हवा इतनी तेज़ है की आप भारतीय बनकर भी रह सकें, तो गनीमत | ऊपर से इस मुद्दे में विरोधाभास है| शिव सेना के ही नेता (स्वर्गिये) प्रमोद नवलकर कह चुके हैं की मराठी की बोलने बाध्यता शिव सेनिकों को थी , उनके बच्चों को नहीं |
अपने इलाके में रोजगार के अवसर हों, तो उत्तर भारतीय मुंबई की ख़ाक छानने न आयें | बिहार के लोग पंजाब जा कर खेत मजदूरी न करें | राजस्थान के लोग हिमाचल जा कर मजदूरी न करें | आंध्र और तमिलनाडु के गरीबी रेखा से नीचे के लोग मुंबई में गगनचुम्बी इमारतें बनाने में ख़ुद को गर्क न करें |
महाराष्ट्र देश का प्रमुख औधोगिक राज्य है | यहाँ भी विकास के टापू हैं |
टाटा इन्स्टीटयूट ऑफ़ सोशल सान्सेज के अध्यन बताते हैं की बर्ष 1991-2001 के दस सालों में महाराष्टर के रत्नागिरी जिले से 91,000 लोग, सतारा से 65,000 लोग, सिंधुदुर्ग से 41,000 लोग और कोल्हापुर से 26,000 लोग मुंबई आए|
इसी दरम्यान उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से 69,000 लोग और बिहार के दरभंगा जिले से 12,000 मुंबई आए हैं |
वैसे तो पूरे भारत के लिए एक समान सोच होनी चाहिए, लेकिन फ़िर राजनीतिक पार्टियों का काम धंधा बंद हो जाएगा|
मराठी के बहुत ही सम्मानित कवि कुसुमग्राज की कविता हमारी इस कटी – फटी सोच को मर्मितिका से वयाकत करती है
मद्य रात्रि के गहराने के बाद
शहर की पाँच प्रतिमाएँ
एक चबूतरे पर बैठ कर
आंसू बहने लगी
ज्योतिबा कहने लगे
में सिर्फ़ कुजड़ौं का बन सका
शिवाजी बोले मैं सिर्फ़ मराठों का
अम्बेडकर कहने लगे मैं सिर्फ़ बौधों का
तिलक बोल पड़े मैं तो केवल सिर्फ़ चित्पावन ब्राह्मणों का
तब गाँधी ने अपनी उमड़ती हुई भावनाओं को रोकते हुए कहा
फ़िर भी आप भाग्यशाली हैं
किसी न किसी जमात के लोग
आपके साथ खड़े हैं
जबकि मेरे पीछे
सिर्फ़ सरकारी कचहरी की दीवारें हैं |
अनूप सेठी (लेखक) हिन्दी के कवि है और मुंबई में रहते हैं |




















